Archive for September 9th, 2007

इंडिया फ़ैशन वीक शुरु

तस्वीरों में-  इंडिया फ़ैशन वीक शुरु
इंडिया फ़ैशन वीक
 
इंडिया फ़ैशन वीक बुधवार को दिल्ली में शुरु हो गया
तस्वीरों में-  इंडिया फ़ैशन वीक शुरु
इंडिया फ़ैशन वीक
तस्वीरों में-  इंडिया फ़ैशन वीक शुरु
इंडिया फ़ैशन वीक

इंडिया फ़ैशन वीक

तस्वीरों में-  इंडिया फ़ैशन वीक शुरु
इंडिया फ़ैशन वीक
तस्वीरों में-  इंडिया फ़ैशन वीक शुरु
इंडिया फ़ैशन वीक
 
इंडिया फ़ैशन वीक में फ़िल्मी हस्तियों ने भी भाग लेना शुरु किया है. पहले दिन फ़िल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता रैंप पर उतरने की तैयारी करती हुईं

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चक दे इंडिया

चेन्नई में भारत ने कोरिया को रौंदकर चक दे इंडिया की कहानी को हकीकत में बदल दिया। इस जीत के नायक अग्रिम पंक्ति के खिलाड़ी प्रभजोत सिंह रहे।

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संजय दत्त की बुरी संगत से परेशान थीं नरगिस

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नई दिल्ली (पीटीआई) : गुजरे जमाने की अदाकारा नरगिस दत्त को अपने बेटे संजय पर आने वाली मुसीबतों का अहसास हो गया था। शायद इसीलिए उन्होंने अपनी बेटी नम्रता से यह ध्यान रखने को कहा था कि संजू अपने कुछ दोस्तों से दूर रहें। नरगिस को यह लगता था कि दोस्तों की सोहबत में संजू गलत राह पकड़ सकते हैं।

इलाज के लिए अमेरिका जाने से पहले नरगिस ने अपनी बेटी नम्रता से कहा था- प्लीज , संजू का ध्यान रखना! देखना , वह फिर से उन मूर्ख लड़कों के चक्कर में न पड़े। वह एकदम भोला है। उसे नहीं पता कि वह क्या कर रहा है और उसे यह भी नहीं पता कि इससे उसका नुकसान होगा। नरगिस को शायद इस बात की आशंका थी कि वह अपने परिवार से हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ने जा रही हैं।

नम्रता को लिखे पत्र में नरगिस ने कहा था कि मेरी हालत ऐसी हो गई है कि मैं तुम सबसे दूर चली गई हूं। मुझे नहीं पता कि क्या होगा , लेकिन भगवान पर मेरा भरोसा है। वह इतने निर्दयी नहीं होंगे कि मुझे तुम लोगों के पास वापस न भेजें।

ये पत्र इस महीने जारी की जाने वाली उस किताब का हिस्सा हैं , जिसे नरगिस दत्त की बेटी प्रिया दत्त और नम्रता ने संजय दत्त के सहयोग से लिखा है। मिस्टर एंड मिसेज दत्त : मेमरीज ऑफ आवर पैरंट्स नामक यह किताब रोली बुक्स ने प्रकाशित की है।

बोर्डिन्ग स्कूल में भेजे जाने के बाद संजय को लिखे पत्र में नरगिस ने उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने और टीचरों को शिकायत का मौका नहीं देने के लिए अच्छे से रहने को कहा था।

नवभारत टाइम्स से।

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बँटवारे के साए में भारत-पाक संबंध

नेहरू और जिन्ना
कांग्रेस नेता नेहरू और जिन्ना के रिश्ते कभी भी बहुत अच्छे नहीं रहे

भारत के विभाजन के साठ साल पूरे होने पर बीबीसी के एंड्रयू व्हाइटहेड ने जायज़ा लिया कि क्यों ब्रिटेन से मिलने वाली आज़ादी के साथ ही दो अलग देश भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आए और भारत-पाकिस्तान रिश्ते किस-किस दौर से गुज़रे हैं.

”एक बड़े क्षेत्र के बहुसंख्यकों को उनकी इच्छा के विपरीत एक ऐसी सरकार के शासन में रहने के लिए बाध्य नहीं किया सकता जिसमें दूसरे समुदाय के लोगों का बहुमत हो. और इसका एकमात्र विकल्प है विभाजन.”

इन शब्दों के साथ ही भारत में ब्रिटेन के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने घोषणा की कि ब्रिटेन एक देश को नहीं बल्कि दो देश को स्वतंत्रता देने जा रहा है. तब भारत की एकता बनाए रखने के साथ ही अल्पसंख्यक मुसलमानों के हितों को सुरक्षित रखने के ब्रिटेन के सभी संवैधानिक फॉर्मूले विफ़ल हो चुके थे.

माउंटबेटन ने अपना यह बयान 3 जून 1947 को दिया था और उसके 10 सप्ताह बाद ही उन्होंने दोनों देशों के स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग भी लिया.

14 अगस्त को कराची में वे स्पष्ट मुस्लिम पहचान के साथ गठित राष्ट्र के गवाह बने और इसके अगले दिन दिल्ली में भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा ले रहे थे. भारत की आबादी पाकिस्तान की तीन गुनी थी और ज़्यादातर लोग हिंदू थे.

ब्रिटिश जज रैडक्लिफ़ को दोनों देशों के बीच सीमा का निर्धारण करने का दायित्व सौंपा गया था.

रैडक्लिफ़ न तो इससे पहले भारत आए थे और न ही इसके बाद कभी आए. इसके बावजूद उन्होंने दोनों देशों के बीच जो सीमारेखा खींची उससे करोड़ों लोगों अंसतुष्ट हो गए.

जल्दबाज़ी में किए गए इस विभाजन ने 20वीं शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक को जन्म दिया.

करोड़ों मुस्लिम सीमा के एक तरफ़ और हिंदू-सिख दूसरी तरफ पहुँच गए.

 एक बड़े क्षेत्र के बहुसंख्यकों को उनकी इच्छा के विपरीत एक ऐसी सरकार के शासन में रहने के लिए बाध्य नहीं किया सकता जिसमें दूसरे समुदाय के लोगों का बहुमत हो. और इसका एकमात्र विकल्प है विभाजन

लॉर्ड माउंटबेटन

भारी संख्या में दोनों तरफ़ के लोगों को सीमा के पार जाना पड़ा. तनाव बढ़ा और सांप्रदायिक संघर्ष शुरू हो गए. इसमे कितने लोग मारे गए इसका सही आँकड़ा कोई नहीं बता सका.

इतिहासकार मानते हैं कि पाँच लाख से अधिक लोग मारे गए, 10 हज़ार महिलाओं के साथ या तो बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया.

एक करोड़ से भी अधिक लोग शरणार्थी हो गए जिसका असर आज भी दक्षिण एशिया की राजनीति और कूटनीति पर दिखता है.

धार्मिक विभाजन

भारत पिछली शताब्दी से ही स्वशासन की माँग कर रहा था और वर्ष 1920 से लेकर 1930 के बीच में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में इसने ज़ोर पकड़ा.

भारत में अल्पसंख्यक मुस्लिम सुमदाय में से अनेक लोगों को ऐसा प्रतीत होने लगा था कि हिंदू बहुल देश में रहना फ़ायदेमंद नहीं होगा.

मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने इस माँग को काफ़ी मज़बूती से उठाया.

मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए अलग देश की माँग करने लगी थी. विश्व युद्ध के बाद राज्यों में हुए चुनावों में मुस्लिम लीग के मज़बूत प्रदर्शन के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि अलग पाकिस्तान की उनकी माँग की अधिक दिनों तक अब अनदेखी नहीं की जा सकती है.

विाजन और हिंसा
अनुमान है कि विभाजन के दौरान हिंसा में पाँच लाख लोग मारे गए

सत्ता हस्तांतरण से साल भर पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) में दोनों समुदायों में हिंसा शुरू हो गई जो धीरे-धीरे फैलने लगी थी.

आज़ादी के दो दिन बाद ही जब यह घोषणा हो गई कि सीमाएं कहाँ होंगी तो पंजाब हिंसा की आग में जल उठा.

ट्रेनों में सीमा पार कर रहे लोगों की लाशें भेजी जाने लगीं और कई बार तो उनके अंग भी क्षत-विक्षत होते थे. दोनो तरफ ही महिलाएं हिंसा और बलात्कार की शिकार हुईं.

कश्मीर और पूर्वी पाकिस्तान के मुद्दे

इसके बाद से वर्षों से यह बहस का विषय बना हुआ है कि विभाजन सही था या ग़लत, इससे बचा जा सकता था या नहीं.

लेकिन दक्षिण एशिया के इतिहासकार मानते हैं कि अगर ब्रिटेन ने विभाजन के लिए इतनी जल्दबाज़ी नहीं दिखाई होती और इसे थोड़ी तैयारी के साथ अंजाम दिया जाता तो काफ़ी हद तक कत्लेआम को टाला जा सकता था.

जम्मू-कश्मीर मसले की वजह से दोनों देशों के बीच संघर्ष बढ़ा. यह राज्य भारत और पाकिस्तान की सीमा पर मुस्लिम बहुल राज्य था लेकिन यह किस देश के साथ जुड़े ये फ़ैसला जम्मू-कश्मीर के हिंदू शासक को करना था.

आज़ादी के कुछ ही महीनों बाद कश्मीर को लेकर भारत-पाकिस्तान में युद्ध शुरू हो गया लेकिन इस विवाद का अब तक कोई हल नहीं निकल पाया.

पाकिस्तान के भूगोल को लेकर भी गंभीर समस्या थी. इसके पूर्वी हिस्से में बंगाली बोलने वाले लोगों का बहुमत था और पश्चिमी हिस्से में पंजाबी बहुल लोग थे.

पूर्वी हिस्से की जनसंख्या अधिक थी लेकिन सत्ता और प्रभाव पश्चिमी पाकिस्तान का अधिक था. वर्ष 1971 में भारतीय सेना ने पश्चिमी पाकिस्तान से आज़ादी के संघर्ष में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों का साथ दिया और एक नए देश बांग्लादेश का जन्म हुआ.

बढ़ते मतभेद

भारत और पाकिस्तान में लगातार प्रतिद्वंद्विता बनी रही और इसकी वजह से दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग कभी पनप नहीं पाया.

भारत में आज भी बड़ी संख्या में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, कुल आबादी का लगभग सातवां हिस्सा. इस वजह से पाकिस्तान से तनाव के कारण भारत की धर्मनिरपेक्ष जीवन पद्धति और धार्मिक सहिष्णुता झुलस चुकी है.

नियाज़ी और अरोड़ा
वर्ष 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश अस्तित्व में आया

1980 के दशक के अंत में कश्मीर में अलगाववादी गतिविधि शुरू होने के बाद से दोनों देशों के बीच रिश्ते और भी ख़राब हुए हैं.

पाकिस्तान लगातार कहता रहा है कि वह कश्मीर के अलगाववादियों को सिर्फ़ नैतिक समर्थन दे रहा है जबकि भारत मानता है कि पड़ोसी देश मुस्लिम चरमपंथियों को संगठित करने के साथ ही हथियार मुहैया करा रहा और प्रशिक्षण भी दे रहा है.

भारत और पाकिस्तान, उस हिंसा के साए से निकलने के लिए कोशिश करते रहे हैं जिसके बीच दोनों देशों का जन्म हुआ था. कश्मीर अधूरे विभाजन का एक पहलू भर है. दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय पहचान बिल्कुल अलग हैं.

इन सबके बावजूद भारत और पाकिस्तान थोड़ी झिझक और कभी-कभी दर्द के साथ ही रिश्तों में मिठास घोलने की कोशिश करते हैं. अगर यह सफल हो गया तो दक्षिण एशिया में 1947 के विभाजन की कड़वी यादें हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी.

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सदी की एक महाआशा…

और पाकिस्तान की आज़ादी और विभाजन के साठ साल पूरे होने के अवसर पर विशेष कार्यक्रम तैयार किए. इसी सिलसिले में बीबीसी हिंदी संवाददाता महबूब ख़ान ने दक्षिण एशिया क्षेत्र के तीन महत्वपूर्ण देशों यानी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति का जायज़ा लेने की कोशिश की. इस विशेष कार्यक्रम के लिए उन्हें पाकिस्तान भी जाना था. इस यात्रा पर उनके अनुभव उन्हीं की ज़ुबानी.

जिस दिन मुझे पाकिस्तान जाने का वीज़ा मिला वो एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए एक ख़ासा यादगार दिन बन गया है. आप सोच सकते हैं कि इसमें क्या बड़ी बात है जब लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे से अनगिनत लोग पाकिस्तान के लिए उड़ान भरते हैं. इस पर मैं कहूँगा कि हाँ, बिल्कुल बड़ी बात है क्योंकि भारतीय पृष्ठभूमि के किसी व्यक्ति को पाकिस्तान का वीज़ा और पाकिस्तानी पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को भारतीय वीज़ा मिलना अब भी कोई बड़ा सपना पूरा होने जैसी बात है भले ही आपके पास ब्रिटेन का लाल पासपोर्ट हो जिसपर अनेक देशों में वीज़ा की ज़रूरत ही नहीं होती है. साठ साल पहले के समय की बात करें तो वह अब सिर्फ़ कल्पना ही लगती है कि लोग सुबह का नाश्ता अमृतसर में करते थे और दोपहर का खाना लाहौर में जाकर खाते थे.

भारत और पाकिस्तान की स्वतंत्रता के साठ साल पूरे होने के मौक़े पर बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के विशेष कार्यक्रम सीज़न के तहत मुझे भी मौक़ा मिला कि भारत में मुसलमानों, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं का हालचाल जानने की कोशिश करें कि साठ साल उनके लिए एक बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में कैसे रहे हैं. भारत में मुसलमान सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं और यही मुसलमान पाकिस्तान में बहुमत में हैं उसी तरह भारत का बहुसंख्यक समुदाय हिंदू – पाकिस्तान में अल्पसंख्या में हैं लेकिन इस मुद्दे पर इन दोनों देशों के बीच अक्सर नोक-झोंक होती रहती है.

1947 में भारत की आज़ादी और पाकिस्तान बनने के समय से ही दोनों देशों में ज़्यादातर समय दुश्मनी का ही माहौल रहा है. भारत में बहुत से लोग मानते हैं कि पाकिस्तान का बनना ही एक ख़राब घटनाक्रम था जबकि कुछ पाकिस्तानी मुस्लिम सोचते हैं कि विभाजन के समय कुछ मुसलमानों ने भारत में ही रहने का फ़ैसला करके ग़लती की थी. भारत में मेरी मुलाक़ात ऐसे बहुत से मुसलमानों से हुई है जो कहते हैं कि या तो पाकिस्तान बनना ही नहीं चाहिए था लेकिन बन गया तो सारे मुसलमानों को पाकिस्तान में जाना चाहिए थे. जबकि भारत में बहुत से मुसलमान ये भी मानते हैं कि उन्हें एक धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में सही जगह मिली है. बहरहाल यह एक अलग कहानी है.

मोहम्मद अली जिन्ना के मज़ार परिसर में महबूब ख़ान
कुछ लोगों का यह भी कहना था कि जिन्ना के मज़ार को ज़रूरत से ज़्यादा जगह दी गई है

भारत और पाकिस्तान में पिछले साठ साल के दौरान अर्थव्यवस्था और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत बड़े बदलाव हो चुके हैं लेकिन अब ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जिनमें दोनों देशों के एक जैसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, मसलन, दोनों देशों को भ्रष्टाचार दीमक की तरह चाट रहा है, सड़कों पर अनुशासनहीनता की वजह अफ़रा-तफ़री, ग़रीब और अमीर के बीच की खाई और संसाधनों का असमान बँटवारा वग़ैरा. दूसरी तरफ़ देखें तो इतिहास, खानपान, वेश-भूषा, नस्ल, मूल्य वग़ैरा एक जैसे हैं लेकिन दोनों देश आधी शताब्दी से भी ज़्यादा समय से कट्टर दुश्मन रहे हैं.

सीमा पर पहली बार और फिर…

मुझे याद आता है कि जून 1999 में जम्मू-कश्मीर में मुझे भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जाने का मौक़ा मिला और सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल ने पाकिस्तानी रेंजरों के साथ मेरी मुलाक़ात का इंतज़ाम किया और वादा किया कि पाकिस्तानी रेंजरों से हाथ भी मिलाने का मौक़ा मिल सकता है मगर मुझे सख़्त हिदायत थी कि मेरे क़दम भारतीय क्षेत्र में ही रहने चाहिए. उस समय मैंने पहली बार किसी पाकिस्तानी व्यक्ति से हाथ मिलाया तो लेकिन अपने क़दम सख़्ती से ज़ीरो लाइन पर भारतीय सीमा में जमाए रखे. अब जब मुझे पाकिस्तान जाने का मौक़ा मिला और मैंने 21 जुलाई को कराची के मोहम्मद अली जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर क़दम रखा तो बहुत सारी उत्सुकताएँ मन में थीं. हवाई अड्डे के बिल्कुल सामने मैक्डोनल्ड रेस्तराँ था जिससे स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान में अमरीकी प्रभाव का दायरा कितना है.

हवाई अड्डे से बाहर निकलकर जिस पहले पाकिस्तानी से मेरा परिचय हुआ वो थे एक उम्रदराज़ ड्राइवर मोहम्मद यूसुफ़ जो मुझे होटल के लिए लेने आए थे और बस कुछ सेकंड की बातचीत में ही पता चल गया कि वह मुहाजिर हैं और भारत से आने वाले किसी व्यक्ति को देखकर उन्हें अपने अतीत की याद आ गई कि उनकी जड़ें मुंबई में हैं और बहुत समय पहले उन्हें मुंबई जाने का मौक़ा मिला भी था मगर…

कराची पहुँचने से एक सप्ताह पहले मैं भी मुंबई में था और महानगर की अपनी पहली यात्रा के दौरान में मुझे तलब हुई कि समुंदर के इस पानी का मिज़ाज जानूँ कि यह सीमा पार करके कराची तक जाकर मिलता है. उत्सुकता जागी कि अगर मौक़ा मिला तो कराची में जाकर समुंदर को देखूंगा. बस होटल में सामान रखने के फ़ौरन बाद पहुँच गए समुंदर किनारे और देखा तो वो पानी भी मुंबई के पानी जैसा ही थी और लोग उसी तरह से उसकी लहरों से खिलवाड़ कर रहे थे. शनिवार की सांझ, हर उम्र के लोग, दूर-दराज़ से भी परिवार आए थे और भारी भीड़ थी.

लाहौर में ऐतिहासिक बादशाही मस्जिद
बादशाही मस्जिद भी शाहजहाँ ने बनवाई थी

बातचीत करने की तलब हुई तो पाया कि पानी की ही तरह बहुत से लोगों ने ख़ुद को किसी न किसी भारत से जुड़ा पाया. जगह-जगह भारतीयता नज़र आ जाती है, मसलन, शहरों में, बाज़ारों-दुकानों में, फ़िल्मों, राजनीति इतिहास, धर्म वग़ैरा. दुकानें भारतीय फ़िल्मों और कपड़ों वग़ैरा से भरी मिलेंगी. बहुत से होटलों के नाम भारतीय शहरों के नाम पर हैं.

दूसरी तरफ़ एक बड़ा अंतर ये है कि भारत में लोकतंत्र ने अच्छी तरह से जड़ें जमा लीं और वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है लेकिन पाकिस्तान में राजनीति और समाज पर सेना का व्यापक प्रभाव रहा है. कुछ लोगों का मानना था कि यह एक तरह से देश के लिए अच्छा है मगर कुछ का कहना था कि सेना का प्रभाव 21वीं सदी में किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं हो सकता.

बहुत सी अन्य समानताएँ भी हैं मसलन, दिल्ली की जामा मस्जिद लाहौर की बादशाही मस्जिद शाहजहाँ ने ही बनवाई थीं लेकिन उसने ताजमहल एक ही बनवाया. हाँ, क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना की कराची में जो मज़ार बनाई गई है उसमें काफ़ी संगमरमर लगाया गया है शायद जगह भी ताजमहल परिसर से ज़्यादा है. कराची में ही एक और प्रतीक चिन्ह ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की याद दिलाता है जिसका नाम है तीन तलवारें. इन तीन तलवारों पर भुट्टो के तीन प्रमुख नारे – विश्वास, एकता और अनुशासन लिखे हुए हैं. भुट्टो के दौर में यह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का चुनाव चिन्हु हुआ करता था लेकिन जनरल ज़ियाउल हक़ के ज़माने में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

सदी की महाआशा

इस पहली पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं हर वर्ग के लोगों से मिला और पाया कि बँटवारे ने मानवता को कल्पना की हद से परे तक प्रभावित किया है और साठ साल गुज़रने के बाद भी वो साया हल्का नहीं पड़ा है. अनेक का कहना था कि बँटवारे से कुछ हासिल नहीं, सिवाय इसके कि जान-माल के भारी नुक़सान के बाद भी दुश्मनी का एक नया युग शुरू हो गया था.

ये सवाल दिमाग़ में बार-बार उठता है कि बँटवारा अब एक ऐतिहासिक सच्चाई है और उसे मिटाया तो नहीं जा सकता लेकिन क्या कभी वो दिन आएगा जब दक्षिण एशिया क्षेत्र के तीन बड़े देश भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सच्चे दोस्त बनेंगे और करोड़ों लोगों का यह सपना पूरा हो सकेगा जब वे बाँहें फैलाकर एक दूसरे से मिल सकेंगे, जहाँ कोई सीमा बंधन नहीं होगा. शताब्दी की यह महाआशा मुझे भी है.

from

BBC

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