सदी की एक महाआशा…

September 9, 2007

और पाकिस्तान की आज़ादी और विभाजन के साठ साल पूरे होने के अवसर पर विशेष कार्यक्रम तैयार किए. इसी सिलसिले में बीबीसी हिंदी संवाददाता महबूब ख़ान ने दक्षिण एशिया क्षेत्र के तीन महत्वपूर्ण देशों यानी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति का जायज़ा लेने की कोशिश की. इस विशेष कार्यक्रम के लिए उन्हें पाकिस्तान भी जाना था. इस यात्रा पर उनके अनुभव उन्हीं की ज़ुबानी.

जिस दिन मुझे पाकिस्तान जाने का वीज़ा मिला वो एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए एक ख़ासा यादगार दिन बन गया है. आप सोच सकते हैं कि इसमें क्या बड़ी बात है जब लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे से अनगिनत लोग पाकिस्तान के लिए उड़ान भरते हैं. इस पर मैं कहूँगा कि हाँ, बिल्कुल बड़ी बात है क्योंकि भारतीय पृष्ठभूमि के किसी व्यक्ति को पाकिस्तान का वीज़ा और पाकिस्तानी पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को भारतीय वीज़ा मिलना अब भी कोई बड़ा सपना पूरा होने जैसी बात है भले ही आपके पास ब्रिटेन का लाल पासपोर्ट हो जिसपर अनेक देशों में वीज़ा की ज़रूरत ही नहीं होती है. साठ साल पहले के समय की बात करें तो वह अब सिर्फ़ कल्पना ही लगती है कि लोग सुबह का नाश्ता अमृतसर में करते थे और दोपहर का खाना लाहौर में जाकर खाते थे.

भारत और पाकिस्तान की स्वतंत्रता के साठ साल पूरे होने के मौक़े पर बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के विशेष कार्यक्रम सीज़न के तहत मुझे भी मौक़ा मिला कि भारत में मुसलमानों, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं का हालचाल जानने की कोशिश करें कि साठ साल उनके लिए एक बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में कैसे रहे हैं. भारत में मुसलमान सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं और यही मुसलमान पाकिस्तान में बहुमत में हैं उसी तरह भारत का बहुसंख्यक समुदाय हिंदू – पाकिस्तान में अल्पसंख्या में हैं लेकिन इस मुद्दे पर इन दोनों देशों के बीच अक्सर नोक-झोंक होती रहती है.

1947 में भारत की आज़ादी और पाकिस्तान बनने के समय से ही दोनों देशों में ज़्यादातर समय दुश्मनी का ही माहौल रहा है. भारत में बहुत से लोग मानते हैं कि पाकिस्तान का बनना ही एक ख़राब घटनाक्रम था जबकि कुछ पाकिस्तानी मुस्लिम सोचते हैं कि विभाजन के समय कुछ मुसलमानों ने भारत में ही रहने का फ़ैसला करके ग़लती की थी. भारत में मेरी मुलाक़ात ऐसे बहुत से मुसलमानों से हुई है जो कहते हैं कि या तो पाकिस्तान बनना ही नहीं चाहिए था लेकिन बन गया तो सारे मुसलमानों को पाकिस्तान में जाना चाहिए थे. जबकि भारत में बहुत से मुसलमान ये भी मानते हैं कि उन्हें एक धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में सही जगह मिली है. बहरहाल यह एक अलग कहानी है.

मोहम्मद अली जिन्ना के मज़ार परिसर में महबूब ख़ान
कुछ लोगों का यह भी कहना था कि जिन्ना के मज़ार को ज़रूरत से ज़्यादा जगह दी गई है

भारत और पाकिस्तान में पिछले साठ साल के दौरान अर्थव्यवस्था और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत बड़े बदलाव हो चुके हैं लेकिन अब ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जिनमें दोनों देशों के एक जैसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, मसलन, दोनों देशों को भ्रष्टाचार दीमक की तरह चाट रहा है, सड़कों पर अनुशासनहीनता की वजह अफ़रा-तफ़री, ग़रीब और अमीर के बीच की खाई और संसाधनों का असमान बँटवारा वग़ैरा. दूसरी तरफ़ देखें तो इतिहास, खानपान, वेश-भूषा, नस्ल, मूल्य वग़ैरा एक जैसे हैं लेकिन दोनों देश आधी शताब्दी से भी ज़्यादा समय से कट्टर दुश्मन रहे हैं.

सीमा पर पहली बार और फिर…

मुझे याद आता है कि जून 1999 में जम्मू-कश्मीर में मुझे भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जाने का मौक़ा मिला और सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल ने पाकिस्तानी रेंजरों के साथ मेरी मुलाक़ात का इंतज़ाम किया और वादा किया कि पाकिस्तानी रेंजरों से हाथ भी मिलाने का मौक़ा मिल सकता है मगर मुझे सख़्त हिदायत थी कि मेरे क़दम भारतीय क्षेत्र में ही रहने चाहिए. उस समय मैंने पहली बार किसी पाकिस्तानी व्यक्ति से हाथ मिलाया तो लेकिन अपने क़दम सख़्ती से ज़ीरो लाइन पर भारतीय सीमा में जमाए रखे. अब जब मुझे पाकिस्तान जाने का मौक़ा मिला और मैंने 21 जुलाई को कराची के मोहम्मद अली जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर क़दम रखा तो बहुत सारी उत्सुकताएँ मन में थीं. हवाई अड्डे के बिल्कुल सामने मैक्डोनल्ड रेस्तराँ था जिससे स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान में अमरीकी प्रभाव का दायरा कितना है.

हवाई अड्डे से बाहर निकलकर जिस पहले पाकिस्तानी से मेरा परिचय हुआ वो थे एक उम्रदराज़ ड्राइवर मोहम्मद यूसुफ़ जो मुझे होटल के लिए लेने आए थे और बस कुछ सेकंड की बातचीत में ही पता चल गया कि वह मुहाजिर हैं और भारत से आने वाले किसी व्यक्ति को देखकर उन्हें अपने अतीत की याद आ गई कि उनकी जड़ें मुंबई में हैं और बहुत समय पहले उन्हें मुंबई जाने का मौक़ा मिला भी था मगर…

कराची पहुँचने से एक सप्ताह पहले मैं भी मुंबई में था और महानगर की अपनी पहली यात्रा के दौरान में मुझे तलब हुई कि समुंदर के इस पानी का मिज़ाज जानूँ कि यह सीमा पार करके कराची तक जाकर मिलता है. उत्सुकता जागी कि अगर मौक़ा मिला तो कराची में जाकर समुंदर को देखूंगा. बस होटल में सामान रखने के फ़ौरन बाद पहुँच गए समुंदर किनारे और देखा तो वो पानी भी मुंबई के पानी जैसा ही थी और लोग उसी तरह से उसकी लहरों से खिलवाड़ कर रहे थे. शनिवार की सांझ, हर उम्र के लोग, दूर-दराज़ से भी परिवार आए थे और भारी भीड़ थी.

लाहौर में ऐतिहासिक बादशाही मस्जिद
बादशाही मस्जिद भी शाहजहाँ ने बनवाई थी

बातचीत करने की तलब हुई तो पाया कि पानी की ही तरह बहुत से लोगों ने ख़ुद को किसी न किसी भारत से जुड़ा पाया. जगह-जगह भारतीयता नज़र आ जाती है, मसलन, शहरों में, बाज़ारों-दुकानों में, फ़िल्मों, राजनीति इतिहास, धर्म वग़ैरा. दुकानें भारतीय फ़िल्मों और कपड़ों वग़ैरा से भरी मिलेंगी. बहुत से होटलों के नाम भारतीय शहरों के नाम पर हैं.

दूसरी तरफ़ एक बड़ा अंतर ये है कि भारत में लोकतंत्र ने अच्छी तरह से जड़ें जमा लीं और वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है लेकिन पाकिस्तान में राजनीति और समाज पर सेना का व्यापक प्रभाव रहा है. कुछ लोगों का मानना था कि यह एक तरह से देश के लिए अच्छा है मगर कुछ का कहना था कि सेना का प्रभाव 21वीं सदी में किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं हो सकता.

बहुत सी अन्य समानताएँ भी हैं मसलन, दिल्ली की जामा मस्जिद लाहौर की बादशाही मस्जिद शाहजहाँ ने ही बनवाई थीं लेकिन उसने ताजमहल एक ही बनवाया. हाँ, क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना की कराची में जो मज़ार बनाई गई है उसमें काफ़ी संगमरमर लगाया गया है शायद जगह भी ताजमहल परिसर से ज़्यादा है. कराची में ही एक और प्रतीक चिन्ह ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की याद दिलाता है जिसका नाम है तीन तलवारें. इन तीन तलवारों पर भुट्टो के तीन प्रमुख नारे – विश्वास, एकता और अनुशासन लिखे हुए हैं. भुट्टो के दौर में यह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का चुनाव चिन्हु हुआ करता था लेकिन जनरल ज़ियाउल हक़ के ज़माने में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

सदी की महाआशा

इस पहली पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं हर वर्ग के लोगों से मिला और पाया कि बँटवारे ने मानवता को कल्पना की हद से परे तक प्रभावित किया है और साठ साल गुज़रने के बाद भी वो साया हल्का नहीं पड़ा है. अनेक का कहना था कि बँटवारे से कुछ हासिल नहीं, सिवाय इसके कि जान-माल के भारी नुक़सान के बाद भी दुश्मनी का एक नया युग शुरू हो गया था.

ये सवाल दिमाग़ में बार-बार उठता है कि बँटवारा अब एक ऐतिहासिक सच्चाई है और उसे मिटाया तो नहीं जा सकता लेकिन क्या कभी वो दिन आएगा जब दक्षिण एशिया क्षेत्र के तीन बड़े देश भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सच्चे दोस्त बनेंगे और करोड़ों लोगों का यह सपना पूरा हो सकेगा जब वे बाँहें फैलाकर एक दूसरे से मिल सकेंगे, जहाँ कोई सीमा बंधन नहीं होगा. शताब्दी की यह महाआशा मुझे भी है.

from

BBC

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